अम्बेडकरनगर के जहांगीरगंज थाना क्षेत्र में महज तीन किलोमीटर की दूरी पर बसे धर्मपुर करमैतेपुर और चंदनपुर गांवों के बीच वर्षों से एक अदृश्य दीवार खड़ी थी। यह दीवार दूरी की नहीं, बल्कि पारिवारिक नाराजगी, सामाजिक बंदिशों और परंपराओं की जकड़न की थी।
लेकिन इसी दीवार को तोड़ते हुए बलवंत सिंह चौहान और सविता ने अपने पांच साल पुराने प्रेम को विवाह का नाम देकर एक नई मिसाल कायम कर दी।
पिछले पांच वर्षों से दोनों एक-दूसरे के साथ जीवन के सपने देख रहे थे। गांव की गलियों में उनके प्रेम की चर्चा आम थी, मगर परिवार इस रिश्ते को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। रिश्तेदारों ने कई बार समझौते की कोशिश की, लेकिन हर बार बात परंपराओं की चौखट पर आकर रुक जाती थी।
हालात तब बदले जब सविता ने अपने जीवन का फैसला खुद लेने का साहस दिखाया। वह सीधे जहांगीरगंज थाने पहुंची और प्रार्थना पत्र देकर अपने प्रेमी के साथ रहने की इच्छा दर्ज कराई। सविता का यह कदम पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया।
पुलिस ने भी मामले को केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रखा। मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए दोनों पक्षों को सुना गया, कानून की जानकारी दी गई और सबसे अहम — दोनों की आपसी सहमति को प्राथमिकता दी गई। बलवंत सिंह चौहान को थाने बुलाकर शांत माहौल में बातचीत की गई और सुरक्षा का भरोसा दिया गया।
इसके बाद पुलिस की मौजूदगी में दोनों नरियांव बावली चौक स्थित मंदिर पहुंचे। न बैंड-बाजा, न बारात और न शोर-शराबा — सिर्फ मंदिर की घंटियां, धूपबत्ती की खुशबू और दो दिलों की धड़कन। भगवान को साक्षी मानकर दोनों ने सात फेरे लिए और जीवन भर साथ निभाने की कसमें खाईं।
कुछ ही घंटों में यह खबर गांव-गांव फैल गई। कोई इसे प्रेम की जीत बता रहा है, तो कोई इसे बेटियों के साहस और अपने फैसले खुद लेने की मिसाल मान रहा है।
यह सिर्फ एक शादी नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ खड़ा एक मजबूत संदेश है, जो आज भी रिश्तों को जाति, गांव और समाज की दीवारों में कैद करना चाहती है।
